श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 1: बाल काण्ड  »  सर्ग 15: ऋष्यशृंग द्वारा राजा दशरथ के पुत्रेष्टि यज्ञ का आरम्भ, ब्रह्माजी का रावण के वध का उपाय ढूँढ़ निकालना  »  श्लोक 28-30h
 
 
श्लोक  1.15.28-30h 
भयं त्यजत भद्रं वो हितार्थं युधि रावणम्।
सपुत्रपौत्रं सामात्यं समन्त्रिज्ञातिबान्धवम्॥ २८॥
हत्वा क्रूरं दुराधर्षं देवर्षीणां भयावहम्।
दशवर्षसहस्राणि दशवर्षशतानि च॥ २९॥
वत्स्यामि मानुषे लोके पालयन् पृथिवीमिमाम्।
 
 
अनुवाद
'देवताओं! आपका कल्याण हो। आप भय त्याग दें। आपके हित के लिए मैं युद्ध में रावण को उसके पुत्र, पौत्र, माता, मंत्री और बन्धु-बान्धवों सहित मार डालूँगा। देवताओं और ऋषियों को आतंकित करने वाले उस क्रूर एवं अत्याचारी राक्षस का विनाश करके मैं इस पृथ्वी का पालन करूँगा और ग्यारह हजार वर्षों तक मनुष्य लोक में निवास करूँगा। 28-29 1/2॥
 
'Gods! May you be well. You give up fear. To benefit you, I will kill Ravana in battle along with his son, grandson, mother, minister and relatives. After destroying that cruel and cruel demon who terrorizes the gods and sages, I will follow this earth and reside in the human world for eleven thousand years. 28-29 1/2॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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