श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 1: बाल काण्ड  »  सर्ग 15: ऋष्यशृंग द्वारा राजा दशरथ के पुत्रेष्टि यज्ञ का आरम्भ, ब्रह्माजी का रावण के वध का उपाय ढूँढ़ निकालना  »  श्लोक 2
 
 
श्लोक  1.15.2 
इष्टिं तेऽहं करिष्यामि पुत्रीयां पुत्रकारणात्।
अथर्वशिरसि प्रोक्तैर्मन्त्रै: सिद्धां विधानत:॥ २॥
 
 
अनुवाद
‘महाराज! आपको पुत्र प्राप्ति के लिए मैं अथर्ववेद के मन्त्रों से पुत्रयेष्टि नामक यज्ञ करूँगा। यदि यह यज्ञ वैदिक विधि से किया जाए, तो अवश्य ही सफल होगा।’॥2॥
 
‘Maharaj! To give you a son, I will perform a yajna called Putrayeshti using the mantras of the Atharvaveda. If the yajna is performed according to the Vedic method, it will definitely be successful.’॥ 2॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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