श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 0: श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण माहात्म्य  »  सर्ग 5: रामायण के नवाह श्रवण की विधि, महिमा तथा फल का वर्णन  »  श्लोक 68
 
 
श्लोक  0.5.68 
रामप्रसादजनकं रामभक्तिविवर्धनम्।
सर्वपापक्षयकरं सर्वसम्पद्विवर्द्धनम्॥ ६८॥
 
 
अनुवाद
रामायण श्री रामचन्द्रजी को सुख देने वाली, श्री रामभक्ति बढ़ाने वाली, सब पापों का नाश करने वाली और समस्त धन-सम्पत्ति की वृद्धि करने वाली है॥68॥
 
Ramayana gives happiness to Shri Ramchandraji, increases devotion to Shri Ram, destroyer of all sins and increases all wealth. 68॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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