श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 0: श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण माहात्म्य  »  सर्ग 5: रामायण के नवाह श्रवण की विधि, महिमा तथा फल का वर्णन  »  श्लोक 52-53h
 
 
श्लोक  0.5.52-53h 
सूत उवाच
एवं सनत्कुमारस्तु नारदेन महात्मना॥ ५२॥
सम्यक् प्रबोधित: सद्य: परां निर्वृतिमाप ह।
 
 
अनुवाद
सूतजी कहते हैं - महात्मा नारदजी से यह उपदेश पाकर सनत्कुमार को तत्काल परम आनंद की प्राप्ति हुई।
 
Sutji says - After receiving this teaching from Mahatma Naradji, Sanatkumara immediately attained supreme bliss. 52 1/2.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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