श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 0: श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण माहात्म्य  »  सर्ग 5: रामायण के नवाह श्रवण की विधि, महिमा तथा फल का वर्णन  »  श्लोक 46-47h
 
 
श्लोक  0.5.46-47h 
तदर्थकमिदं पुण्यं काव्यं श्राव्यमनुत्तमम्॥ ४६॥
श्रवणात् पठनाद् वापि सर्वपापविनाशकृत्।
 
 
अनुवाद
वे इस पवित्र काव्य के विषय हैं, इसलिए यह परम उत्तम काव्य सदैव श्रवण करने योग्य है। इसके श्रवण या पाठ से समस्त पाप नष्ट हो जाते हैं। ॥46 1/2॥
 
They are the subjects of this sacred poem, therefore this most excellent poem is always worth listening to. Listening to it or reciting it destroys all sins. ॥ 46 1/2 ॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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