श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 0: श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण माहात्म्य  »  सर्ग 5: रामायण के नवाह श्रवण की विधि, महिमा तथा फल का वर्णन  »  श्लोक 31
 
 
श्लोक  0.5.31 
एवं व्रतं च षड्वारं कुर्याद् यस्तु समाहित:।
अग्निष्टोमस्य यज्ञस्य फलमष्टगुणं लभेत्॥ ३१॥
 
 
अनुवाद
जो मनुष्य पूर्ण एकाग्रता के साथ इस प्रकार रामायण कथा का छह बार पाठ करने का अनुष्ठान पूर्ण करता है, उसे अग्निष्टोमय यज्ञ करने का आठ गुना फल प्राप्त होता है ॥31॥
 
He who with full concentration completes the ritual of reciting the Ramayana story six times in this manner, gets eight times the benefits of performing an Agnishtomaya Yajna. ॥ 31॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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