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श्लोक 0.5.27-29  |
यदि द्वयं कृतं तस्य पुण्डरीकफलं लभेत्॥ २७॥
व्रतधारी तु श्रवणं य: कुर्यात् स जितेन्द्रिय:।
अश्वमेधस्य यज्ञस्य द्विगुणं फलमश्नुते॥ २८॥
चतु:कृत्व: श्रुतं येन कथितं मुनिसत्तमा:।
स लभेत् परमं पुण्यमग्निष्टोमाष्टसम्भवम्॥ २९॥ |
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| अनुवाद |
| यदि यह कथा दो बार सुनी जाए तो श्रोता को पुण्डरीकयज्ञ का फल मिलता है। जो जितेन्द्रिय पुरुष व्रत करके रामायण की कथा सुनता है, उसे दो अश्वमेधयज्ञों का फल मिलता है। मुनिवरो! जिसने इस कथा को चार बार सुना है, उसे आठ अग्निष्टोमों का परम फल प्राप्त होता है। 27-29॥ |
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| If this story is heard twice then the listener gets the results of Pundarikayagya. The Jitendriya man who fasts and listens to the story of Ramayana, gets the fruit of two Ashvamedhyajnas. Munivaro! One who has heard this story four times, gets the ultimate reward of the eight Agnistoms. 27-29॥ |
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