श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 0: श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण माहात्म्य  »  सर्ग 5: रामायण के नवाह श्रवण की विधि, महिमा तथा फल का वर्णन  »  श्लोक 17
 
 
श्लोक  0.5.17 
नास्तिकान् भिन्नमर्यादान् निन्दकान् पिशुनानपि।
रामायणव्रतपरो वाङ्मात्रेणापि नार्चयेत्॥ १७॥
 
 
अनुवाद
रामायण व्रत का पालन करने वाले को चाहिए कि वह नास्तिक, धर्म का उल्लंघन करने वाले, निन्दा करने वाले तथा चुगलखोरों का शब्दों से भी आदर न करे ॥17॥
 
A person observing the vow of Ramayana should not respect even by words those who are atheists, violators of religious norms, slanderers and gossipmongers. ॥17॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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