श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 0: श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण माहात्म्य  »  सर्ग 5: रामायण के नवाह श्रवण की विधि, महिमा तथा फल का वर्णन  »  श्लोक 15
 
 
श्लोक  0.5.15 
एवं य: प्रयत: कुर्याद् रामायणविधिं तथा।
स याति विष्णुभवनं पुनरावृत्तिदुर्लभम्॥ १५॥
 
 
अनुवाद
इस प्रकार जो मनुष्य अपने मन और इन्द्रियों को वश में करके रामायण का अनुष्ठान करता है, वह भगवान विष्णु के धाम को जाता है, जहाँ से वह इस संसार में कभी लौटकर नहीं आता ॥15॥
 
In this manner, one who controls his mind and senses and performs the rituals of the Ramayana goes to the abode of Lord Vishnu, from where he never returns to this world. ॥15॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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