श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 0: श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण माहात्म्य  »  सर्ग 5: रामायण के नवाह श्रवण की विधि, महिमा तथा फल का वर्णन  »  श्लोक 1
 
 
श्लोक  0.5.1 
सूत उवाच
रामायणस्य माहात्म्यं श्रुत्वा प्रीतो मुनीश्वर:।
सनत्कुमार: पप्रच्छ नारदं मुनिसत्तमम्॥ १॥
 
 
अनुवाद
सूतजी कहते हैं- रामायण का यह माहात्म्य सुनकर ऋषि सनत्कुमार बहुत प्रसन्न हुए। उन्होंने पुनः महर्षि नारदजी से प्रश्न किया।
 
Sutji says- On hearing this greatness of Ramayana, sage Sanatkumara became very happy. He again inquired from the great sage Naradji.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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