श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 0: श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण माहात्म्य  »  सर्ग 4: चैत्रमास में रामायण के पठन और श्रवण का माहात्म्य, कलिक नामक व्याध और उत्तङ्क मुनि की कथा  »  श्लोक 7
 
 
श्लोक  0.4.7 
देवस्वहरणे नित्यं परस्वहरणे तथा।
तेन पापान्यनेकानि कृतानि सुमहान्ति च॥ ७॥
 
 
अनुवाद
वह न केवल दूसरों का धन चुराता था, अपितु देवताओं का धन भी हड़प लेता था। उसने अपने जीवन में अनेक महान पाप किए थे ॥7॥
 
Not only did he regularly steal other people's wealth, he would usurp even the wealth of the gods. He had committed many great sins in his life. ॥ 7॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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