श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 0: श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण माहात्म्य  »  सर्ग 4: चैत्रमास में रामायण के पठन और श्रवण का माहात्म्य, कलिक नामक व्याध और उत्तङ्क मुनि की कथा  »  श्लोक 5
 
 
श्लोक  0.4.5 
आसीत् पुरा कलियुगे कलिको नाम लुब्धक:।
परदारपरद्रव्यहरणे सततं रत:॥ ५॥
 
 
अनुवाद
प्राचीन कलियुग में कालिक नाम का एक शिकारी रहता था, जो सदैव दूसरों की स्त्रियों और धन का अपहरण करने में लगा रहता था ॥5॥
 
In the ancient Kaliyug, there lived a hunter named Kalik. He was always busy in kidnapping other's women and wealth. ॥ 5॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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