श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 0: श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण माहात्म्य  »  सर्ग 4: चैत्रमास में रामायण के पठन और श्रवण का माहात्म्य, कलिक नामक व्याध और उत्तङ्क मुनि की कथा  »  श्लोक 45-46
 
 
श्लोक  0.4.45-46 
सनत्कुमार यत् पृष्टं तत् सर्वं गदितं मया॥ ४५॥
रामायणस्य माहात्म्यं किमन्यच्छ्रोतुमिच्छसि॥ ४६॥
 
 
अनुवाद
सनत्कुमार! रामायण का माहात्म्य जो कुछ तुमने पूछा था, वह सब मैंने तुम्हें बता दिया है। अब तुम और क्या सुनना चाहते हो?॥ 45-45॥
 
Sanatkumar! I have told you everything you asked about the significance of Ramayana. What else do you want to hear?॥ 45-45॥
 
इति श्रीस्कन्दपुराणे उत्तरखण्डे नारदसनत्कुमारसंवादे रामायणमाहात्म्ये चैत्रमासफलानुकीर्तनं नाम चतुर्थोऽध्याय:॥ ४॥
इस प्रकार श्रीस्कन्दपुराणके उत्तरखण्डमें नारद-सनत्कुमारसंवादके अन्तर्गत रामायणमाहात्म्यके प्रसंगमें चैत्रमासमें रामायण सुननेके फलका वर्णन नामक चौथा अध्याय पूरा हुआ॥ ४॥
 
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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