श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 0: श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण माहात्म्य  »  सर्ग 4: चैत्रमास में रामायण के पठन और श्रवण का माहात्म्य, कलिक नामक व्याध और उत्तङ्क मुनि की कथा  »  श्लोक 42
 
 
श्लोक  0.4.42 
ततो विमानमारुह्य सर्वकामसमन्वितम्।
अप्सरोगणसंकीर्णं प्रपेदे हरिमन्दिरम्॥ ४२॥
 
 
अनुवाद
तत्पश्चात् वह अप्सराओं से युक्त तथा समस्त इच्छित सुखों से युक्त विमान पर चढ़कर श्री हरि के परम धाम में पहुँचा॥42॥
 
After that, boarding a plane filled with Apsaras and full of all the desired pleasures, he reached the supreme abode of Shri Hari. 42॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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