श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 0: श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण माहात्म्य  »  सर्ग 4: चैत्रमास में रामायण के पठन और श्रवण का माहात्म्य, कलिक नामक व्याध और उत्तङ्क मुनि की कथा  »  श्लोक 40
 
 
श्लोक  0.4.40 
विमुक्तस्त्वत्प्रसादेन महापातकसंकटात्।
तस्मान्नतोऽस्मि ते विद्वन् यत् कृतं तत् क्षमस्व मे॥ ४०॥
 
 
अनुवाद
'विद्वान! आपकी कृपा से मैं महान पापों के भय से मुक्त हो गया हूँ। अतः मैं आपके चरणों में प्रणाम करता हूँ। कृपया मेरे द्वारा किए गए अपराध को क्षमा करें।'॥40॥
 
'Vidwan! By your grace I have been freed from the danger of great sins. Therefore I bow down to your feet. Please forgive me for the crime I have committed.'॥ 40॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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