श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 0: श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण माहात्म्य  »  सर्ग 4: चैत्रमास में रामायण के पठन और श्रवण का माहात्म्य, कलिक नामक व्याध और उत्तङ्क मुनि की कथा  »  श्लोक 1-3
 
 
श्लोक  0.4.1-3 
नारद उवाच
अन्यमासं प्रवक्ष्यामि शृणुध्वं सुसमाहिता:।
सर्वपापहरं पुण्यं सर्वदु:खनिबर्हणम्॥ १॥
ब्राह्मणक्षत्रियविशां शूद्राणां चैव योषिताम्।
समस्तकामफलदं सर्वव्रतफलप्रदम्॥ २॥
दु:स्वप्ननाशनं धन्यं भुक्तिमुक्तिफलप्रदम्।
रामायणस्य माहात्म्यं श्रोतव्यं च प्रयत्नत:॥ ३॥
 
 
अनुवाद
नारदजी कहते हैं - हे महर्षियों! अब मैं रामायण पढ़ने और सुनने के लिए उपयोगी दूसरे मास का वर्णन कर रहा हूँ। एकाग्रचित्त होकर सुनो। रामायण का माहात्म्य सब पापों का नाश करने वाला, पुण्यों को उत्पन्न करने वाला और सब दुःखों का नाश करने वाला है। यह ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र और स्त्रियों को सभी मनोवांछित फल देने वाला है। यह सभी प्रकार के व्रतों का फल भी देता है। यह दुःस्वप्नों का नाश करने वाला, धन-धान्य से युक्त और भोग तथा मोक्ष रूपी फल देने वाला है। अतः इसे बड़े यत्न से सुनना चाहिए। 1-3।
 
Naradji says - O great sages! Now I am describing the second month which is useful for reading and listening to Ramayana. Listen with concentration. The significance of Ramayana destroys all sins, generates virtues and removes all sorrows. It gives all the desired results to Brahmins, Kshatriyas, Vaishyas, Shudras and women. It also gives the result of all types of fasts. It destroys nightmares, makes one acquire wealth and gives results in the form of enjoyment and salvation. Therefore, it should be listened to with great effort. 1-3.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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