श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 0: श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण माहात्म्य  »  सर्ग 3: माघमास में रामायण-श्रवण का फल - राजा सुमति और सत्यवती के पूर्व जन्म का इतिहास  »  श्लोक 55
 
 
श्लोक  0.3.55 
तत्रापि तावत्कालं च भुक्त्वा भोगाननुत्तमान्।
तत: पृथ्वीं वयं प्राप्ता: क्रमेण मुनिसत्तम॥ ५५॥
 
 
अनुवाद
मुनिश्रेष्ठ! उतने ही समय तक इन्द्रलोक में परम सुख भोगकर हम क्रमशः इस पृथ्वी पर आये हैं ॥55॥
 
Munishrestha! After enjoying the supreme pleasures in Indralok for the same period of time, we have gradually come to this earth. 55॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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