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श्लोक 0.3.32  |
मृगमांसाशनं नित्यं तथा मार्गविरोधकृत्।
एकाकी दु:खबहुलो न्यवसं निर्जने वने॥ ३२॥ |
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| अनुवाद |
| वहाँ मैं प्रतिदिन हिरण का मांस खाकर तथा काँटे आदि बिछाकर लोगों का मार्ग रोककर अपना जीवन निर्वाह करता था। इस प्रकार अत्यन्त कष्ट सहता हुआ मैं उस निर्जन वन में अकेला रहने लगा। |
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| There I lived by eating deer meat every day and by spreading thorns etc. I would obstruct the way of people. In this way, suffering a lot of pain, I began to live alone in that deserted forest. |
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