श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 0: श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण माहात्म्य  »  सर्ग 1: कलियुग की स्थिति, कलिकाल के मनुष्यों के उद्धार का उपाय, रामायणपाठ, उसकी महिमा, उसके श्रवण के लिये उत्तम काल आदि का वर्णन  »  श्लोक 38-39h
 
 
श्लोक  0.1.38-39h 
तावत्पापानि देहेऽस्मिन् निवसन्ति तपोधना:॥ ३८॥
यावन्न श्रूयते सम्यक् श्रीमद्रामायणं नरै:।
 
 
अनुवाद
तपोधनो! ​​इस शरीर में पाप तभी तक रहते हैं, जब तक मनुष्य श्री रामायण कथा का विधिपूर्वक श्रवण नहीं करता।
 
Tapodhano! Sins remain in this body only until a person listens to Shri Ramayana Katha properly.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)