श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 0: श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण माहात्म्य  »  सर्ग 1: कलियुग की स्थिति, कलिकाल के मनुष्यों के उद्धार का उपाय, रामायणपाठ, उसकी महिमा, उसके श्रवण के लिये उत्तम काल आदि का वर्णन  »  श्लोक 29
 
 
श्लोक  0.1.29 
ब्रह्मेशविष्ण्वाख्यशरीरभेदै-
र्विश्वं सृजत्यत्ति च पाति यश्च।
तमादिदेवं परमं वरेण्य-
माधाय चेतस्युपयाति मुक्तिम्॥ २९॥
 
 
अनुवाद
ब्रह्मा, रुद्र और विष्णु नाम से भिन्न-भिन्न रूपों में जगत् की रचना, संहार और पालन करने वाले आदिदेव, परब्रह्म परमात्मा श्री रामचन्द्रजी का मन्दिर अपने हृदय में स्थापित करके मनुष्य मोक्ष का भागी बनता है॥29॥
 
Man becomes a part of salvation by installing in his heart the temple of the Adidev, the Supreme Supreme Soul Shri Ramchandraji, who creates, destroys and sustains the world in different forms named Brahma, Rudra and Vishnu. 29॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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