| श्री रामचरितमानस » काण्ड 7: उत्तर काण्ड » दोहा 0d |
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| | | | काण्ड 7 - दोहा 0d  | भरत नयन भुज दच्छिन फरकत बारहिं बार।
जानि सगुन मन हरष अति लागे करन बिचार॥0घ॥ | | | | अनुवाद | | | | भरत की दाहिनी आँख और दाहिनी भुजा बार-बार फड़क रही थी। इसे शुभ शकुन जानकर वे बहुत प्रसन्न हुए और सोचने लगे- | | | | Bharata's right eye and right arm were twitching repeatedly. Knowing this to be a good omen, he felt very happy and started thinking- | |
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