श्री रामचरितमानस  »  काण्ड 4: किष्किंधा काण्ड  »  सोरठा 0b
 
 
काण्ड 4 - सोरठा 0b 
जरत सकल सुर बृंद बिषम गरल जेहिं पान किय।
तेहि न भजसि मन मंद को कृपाल संकर सरिस॥0ख॥
 
अनुवाद
 
 हे मन्दबुद्धि! तुम शंकरजी की पूजा क्यों नहीं करते, जिन्होंने स्वयं हलाहल विष पी लिया था, जिससे समस्त देवता जल रहे थे? उनके समान दयालु और कौन है?
 
O slow-minded one! Why don't you worship Shankarji, who himself drank the deadly poison Halahal, by which all the gods were burning? Who else is as kind as him?
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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