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काण्ड 3 - दोहा 45  |
गुनागार संसार दुख रहित बिगत संदेह।
तजि मम चरन सरोज प्रिय तिन्ह कहुँ देह न गेह॥45॥ |
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| अनुवाद |
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| वे पुण्यों के धाम संसार के दुःखों से रहित हैं और संशय से सर्वथा मुक्त हैं। मेरे चरणकमलों के अतिरिक्त उन्हें न तो अपना शरीर प्रिय है और न ही अपना घर। |
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| The abode of virtues is free from the sorrows of the world and is completely free from doubts. They love neither their body nor their home except my lotus feet. |
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