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काण्ड 2 - सोरठा 50  |
सखिन्ह सिखावनु दीन्ह सुनत मधुर परिनाम हित।
तेइँ कछु कान न कीन्ह कुटिल प्रबोधी कूबरी॥50॥ |
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| अनुवाद |
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| इस प्रकार सखियों ने ऐसी सलाह दी जो सुनने में मधुर और फल देने वाली थी, परन्तु कुटिल कुबेरी द्वारा सिखाई गई कैकेयी ने उस पर ध्यान नहीं दिया। |
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| In this way the friends gave such advice which was sweet to hear and beneficial in results. But Kaikeyi who was taught by the devious Kuberi did not pay any heed to it. |
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