श्री रामचरितमानस  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सोरठा 326
 
 
काण्ड 2 - सोरठा 326 
भरत चरित करि नेमु तुलसी जो सादर सुनहिं।
सीय राम पद पेमु अवसि होइ भव रस बिरति॥326॥
 
अनुवाद
 
 तुलसीदास कहते हैं, "जो कोई आदर और अनुशासन के साथ भरत की कथा सुनेगा, उसे सीता के चरणों में अवश्य ही प्रेम हो जाएगा और वह सांसारिक सुखों से विरक्त हो जाएगा।"
 
Tulsidas says, "Whoever will listen to Bharat's story with respect and discipline will definitely develop love for the feet of Sita and will be detached from worldly pleasures."
 
इति श्रीमद्रामचरितमानसे सकलकलिकलुषविध्वंसने द्वितीयः सोपानः समाप्तः।
कलियुग के सम्पूर्ण पापों को विध्वंस करने वाले श्री रामचरित मानस का यह दूसरा सोपान समाप्त हुआ।
(अयोध्याकाण्ड समाप्त)
 
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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