श्री रामचरितमानस  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  दोहा 291
 
 
काण्ड 2 - दोहा 291 
ग्यान निधान सुजान सुचि धरम धीर नरपाल।
तुम्ह बिनु असमंजस समन को समरथ एहि काल॥291॥
 
अनुवाद
 
 हे राजन! आप ज्ञान के भंडार हैं, बुद्धिमान हैं, पवित्र हैं और धर्म में धैर्य रखते हैं। आपके अलावा और कौन इस दुविधा का समाधान करने में समर्थ है?
 
O King! You are a storehouse of knowledge, wise, pure and patient in Dharma. Who else is capable of solving this dilemma apart from you?
 ✨ ai-generated
 
 
  Connect Form
  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
  © 2026 vedamrit.in All Rights Reserved. Developed by AmritChaitanyaDas