| श्री रामचरितमानस » काण्ड 2: अयोध्या काण्ड » दोहा 283 |
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| | | | काण्ड 2 - दोहा 283  | कौसल्या कह धीर धरि सुनहु देबि मिथिलेसि।
को बिबेकनिधि बल्लभहि तुम्हहि सकइ उपदेसि॥283॥ | | | | अनुवाद | | | | तब कौसल्याजी ने धैर्यपूर्वक कहा- हे देवी मिथिलेश्वरी! सुनो, हे ज्ञान के भण्डार श्री जनकजी की प्रियतम, तुम्हें कौन उपदेश दे सकता है? | | | | Kausalyaji then said with patience- O Goddess Mithileshwari! Listen, who can give you advice, beloved of Shri Janakji, the storehouse of knowledge? | |
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