| श्री रामचरितमानस » काण्ड 2: अयोध्या काण्ड » दोहा 27 |
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| | | | काण्ड 2 - दोहा 27  | मागु मागु पै कहहु पिय कबहुँ न देहु न लेहु।
देन कहेहु बरदान दुइ तेउ पावत संदेहु॥27॥ | | | | अनुवाद | | | | हे प्रियतम! तुम माँगते तो हो पर देते नहीं, लेते नहीं। तुमने दो वरदान माँगे थे, पर मुझे संदेह है कि वे भी मुझे मिलेंगे। | | | | O beloved! You keep asking for things but you never give or take anything. You had asked for two boons, but I doubt if I will get them too. | |
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