| श्री रामचरितमानस » काण्ड 2: अयोध्या काण्ड » दोहा 265 |
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| | | | काण्ड 2 - दोहा 265  | सुनि सुर मत सुरगुर कहेउ भल तुम्हार बड़ भागु।
सकल सुमंगल मूल जग भरत चरन अनुरागु॥265॥ | | | | अनुवाद | | | | देवताओं की राय सुनकर देवगुरु बृहस्पतिजी बोले- तुमने ठीक सोचा है, तुम बड़े भाग्यशाली हो। भरतजी के चरणों का प्रेम ही संसार में समस्त मंगलों का मूल है। | | | | After listening to the opinion of the gods, Devaguru Brihaspatiji said- You have thought well, you are very fortunate. The love for Bharataji's feet is the root of all auspiciousness in the world. | |
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