श्री रामचरितमानस  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  दोहा 229
 
 
काण्ड 2 - दोहा 229 
छत्रि जाति रघुकुल जनमु राम अनुग जगु जान।
लातहुँ मारें चढ़ति सिर नीच को धूरि समान॥229॥
 
अनुवाद
 
 संसार जानता है कि मैं क्षत्रिय कुल में, रघुकुल कुल में उत्पन्न हुआ हूँ और श्री रामजी (आप) का अनुयायी (सेवक) हूँ। (फिर कोई इसे कैसे सहन कर सकता है?) जो धूल के समान नीच है, परन्तु लात मारने पर वह भी सिर पर चढ़ जाता है॥
 
The world knows that I am born in the Kshatriya caste, in the Raghukul clan and that I am a follower (servant) of Shri Ramji (you). (Then how can one tolerate it?) Who is as low as dust, but even that rises to the head when kicked.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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