श्री रामचरितमानस  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  दोहा 207
 
 
काण्ड 2 - दोहा 207 
अब अति कीन्हेहु भरत भल तुम्हहि उचित मत एहु।
सकल सुमंगल मूल जग रघुबर चरन सनेहु॥207॥
 
अनुवाद
 
 हे भरत! अब तुमने बहुत अच्छा काम किया है, यह राय तुम्हारे लिए उचित ही थी। श्री रामचंद्रजी के चरणों में प्रेम रखना ही संसार के समस्त सुंदर मंगलों का मूल है।
 
O Bharata! Now you have done a very good deed, this opinion was right for you. To have love for the feet of Shri Ramchandraji is the root of all the beautiful auspiciousness in the world.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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