| श्री रामचरितमानस » काण्ड 2: अयोध्या काण्ड » दोहा 159 |
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| | | | काण्ड 2 - दोहा 159  | सुनि सुत बचन सनेहमय कपट नीर भरि नैन।
भरत श्रवन मन सूल सम पापिनि बोली बैन॥159॥ | | | | अनुवाद | | | | अपने पुत्र के स्नेहपूर्ण वचन सुनकर पापिनी कैकेयी ने कपट के आँसू आँखों में भरकर ऐसे वचन कहे, जो भरत के कानों और मन में काँटे के समान चुभ गए - | | | | Hearing the affectionate words of her son, the sinful Kaikeyi, with tears of deceit in her eyes, spoke words that pierced Bharat's ears and mind like a thorn - | |
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