श्री रामचरितमानस  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  चौपाई 303.2
 
 
काण्ड 2 - चौपाई 303.2 
रामहि चितवत चित्र लिखे से। सकुचत बोलत बचन सिखे से॥
भरत प्रीति नति बिनय बड़ाई। सुनत सुखद बरनत कठिनाई॥2॥
 
अनुवाद
 
 सब लोग श्री रामचंद्रजी को ऐसे देख रहे हैं मानो वे चित्र-वर्णनकर्ता हों। उन्हें जो सिखाया गया है, वही वे संकोचपूर्वक कह ​​रहे हैं। भरतजी का प्रेम, विनय, शील और महानता सुनने में तो सुखदायी है, परन्तु उनका वर्णन करना कठिन है।
 
Everyone is looking at Shri Ramchandraji as if he is a picture-teller. They speak the words they have been taught to, hesitantly. Bharatji's love, humility, modesty and greatness are pleasing to hear, but it is difficult to describe them.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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