| श्री रामचरितमानस » काण्ड 2: अयोध्या काण्ड » चौपाई 166.2 |
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| | | | काण्ड 2 - चौपाई 166.2  | सुनतहिं लखनु चले उठि साथा। रहहिं न जतन किए रघुनाथा॥
तब रघुपति सबही सिरु नाई। चले संग सिय अरु लघु भाई॥2॥ | | | | अनुवाद | | | | यह सुनकर लक्ष्मण भी उठकर उनके साथ चल पड़े। श्री रघुनाथजी ने उन्हें रोकने की बहुत कोशिश की, लेकिन वे रुक न सके। तब श्री रघुनाथजी ने सबको सिर झुकाकर प्रणाम किया और सीता तथा छोटे भाई लक्ष्मण को साथ लेकर चल पड़े। | | | | On hearing this, Lakshmana also got up and went along with them. Shri Raghunatha tried very hard to stop him, but he could not stop. Then Shri Raghunathaji bowed his head to everyone and left taking Sita and younger brother Lakshmana with him. | |
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