|
| |
| |
काण्ड 2 - चौपाई 158.2  |
एक निमेष बरष सम जाई। एहि बिधि भरत नगर निअराई॥
असगुन होहिं नगर पैठारा। रटहिं कुभाँति कुखेत करारा॥2॥ |
| |
| अनुवाद |
| |
| हर पल एक साल के समान बीत रहा था। इस तरह भरत नगर के निकट पहुँचे। नगर में प्रवेश करते ही अपशकुन होने लगे। कौवे बुरी जगहों पर बैठे थे और बुरी तरह काँव-काँव कर रहे थे। |
| |
| Every moment was passing like a year. Thus Bharata reached near the city. While entering the city, bad omens started happening. Crows were sitting in bad places and cawing badly. |
|
|
| ✨ ai-generated |
| |
|