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श्लोक 9.65.38-39h  |
इति श्रुत्वा तु वचनं द्रोणपुत्रस्य कौरव:।
मनस: प्रीतिजननं कृपं वचनमब्रवीत्॥ ३८॥
आचार्य शीघ्रं कलशं जलपूर्णं समानय। |
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| अनुवाद |
| द्रोणपुत्र के ये हृदयस्पर्शी वचन सुनकर कौरवराज दुर्योधन ने कृपाचार्य से कहा - 'आचार्य! कृपया शीघ्र ही जल से भरा हुआ घड़ा ले आइए।' |
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| Hearing these heart-warming words of Drona's son, King of the Kurus Duryodhana said to Krupacharya - 'Acharya! Please bring the pitcher filled with water as soon as possible.' 38 1/2 |
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