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mahabharat 9.55.11-12: महाराज! तब 'बहुत अच्छा' कहकर पराक्रमी कुन्तीपुत्र राजा युधिष्ठिर समन्तपंचक तीर्थ की ओर चले। उस समय महाप्रतापी राजा दुर्योधन क्रोध में भरकर हाथ में एक विशाल गदा लेकर पाण्डवों के साथ पैदल चल पड़े।   |   mahabharat अध्याय 9.55: बलरामजीकी सलाहसे सबका कुरुक्षेत्रके समन्तपंचक तीर्थमें जाना और वहाँ भीम तथा दुर्योधनमें गदायुद्धकी तैयारी   ।   mahabharat पर्व 9: शल्य पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 9: शल्य पर्व  »  अध्याय 55: बलरामजीकी सलाहसे सबका कुरुक्षेत्रके समन्तपंचक तीर्थमें जाना और वहाँ भीम तथा दुर्योधनमें गदायुद्धकी तैयारी  »  श्लोक 11-12
 
 
श्लोक  9.55.11-12 
तथेत्युक्त्वा महाराज कुन्तीपुत्रो युधिष्ठिर:।
समन्तपञ्चकं वीर: प्रायादभिमुख: प्रभु:॥ ११॥
ततो दुर्योधनो राजा प्रगृह्य महतीं गदाम्।
पद्‍भ्याममर्षी द्युतिमानगच्छत् पाण्डवै: सह॥ १२॥
 
 
अनुवाद
महाराज! तब 'बहुत अच्छा' कहकर पराक्रमी कुन्तीपुत्र राजा युधिष्ठिर समन्तपंचक तीर्थ की ओर चले। उस समय महाप्रतापी राजा दुर्योधन क्रोध में भरकर हाथ में एक विशाल गदा लेकर पाण्डवों के साथ पैदल चल पड़े।
 
Maharaj! Then saying 'very good', the valiant King Yudhishthira, son of Kunti, proceeded towards the Samantapancaka Tirtha. At that time, the illustrious King Duryodhan, filled with resentment, walked on foot with the Pandavas, carrying a huge mace in his hand.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)