श्री महाभारत  »  पर्व 9: शल्य पर्व  »  अध्याय 54: प्लक्षप्रस्रवण आदि तीर्थों तथा सरस्वतीकी महिमा एवं नारदजीसे कौरवोंके विनाश और भीम तथा दुर्योधनके युद्धका समाचार सुनकर बलरामजीका उसे देखनेके लिये जाना  »  श्लोक 5
 
 
श्लोक  9.54.5 
अत्र विष्णु: पुरा देवस्तप्तवांस्तप उत्तमम्।
अत्रास्य विधिवद् यज्ञा: सर्वे वृत्ता: सनातना:॥ ५॥
 
 
अनुवाद
प्राचीन काल में भगवान विष्णु ने यहाँ घोर तपस्या की थी और उनके सभी सनातन यज्ञ विधिपूर्वक यहीं सम्पन्न हुए थे।॥5॥
 
In ancient times Lord Vishnu performed great penance here, and all his eternal yagyas were performed here as per the prescribed rituals. ॥ 5॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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