श्री महाभारत  »  पर्व 9: शल्य पर्व  »  अध्याय 54: प्लक्षप्रस्रवण आदि तीर्थों तथा सरस्वतीकी महिमा एवं नारदजीसे कौरवोंके विनाश और भीम तथा दुर्योधनके युद्धका समाचार सुनकर बलरामजीका उसे देखनेके लिये जाना  »  श्लोक 36-37
 
 
श्लोक  9.54.36-37 
सोऽवतीर्याचलश्रेष्ठात् प्लक्षप्रस्रवणाच्छुभात्॥ ३६॥
तत: प्रीतमना राम: श्रुत्वा तीर्थफलं महत्।
विप्राणां संनिधौ श्लोकमगायदिममच्युत:॥ ३७॥
 
 
अनुवाद
फिर वे प्लक्षप्रस्रवण नामक शुभ पर्वत शिखर से नीचे उतरे और अपनी तीर्थयात्रा का महान फल सुनकर प्रसन्न होकर अच्युत बलरामजी ने ब्राह्मणों के समीप यह श्लोक गाया - 36-37॥
 
Then he came down from the auspicious mountain peak named Plaksha Prasravana and after hearing the great result of his pilgrimage, Achyuta Balram, being happy, sang this verse near the Brahmins - 36-37॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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