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श्लोक 9.54.35-36h  |
वैशम्पायन उवाच
नारदस्य वच: श्रुत्वा तानभ्यर्च्य द्विजर्षभान्।
सर्वान् विसर्जयामास ये तेनाभ्यागता: सह॥ ३५॥
गम्यतां द्वारकां चेति सोऽन्वशादनुयायिन:। |
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| अनुवाद |
| वैशम्पायनजी कहते हैं - राजन! नारदजी के वचन सुनकर बलरामजी ने अपने साथ आये श्रेष्ठ ब्राह्मणों का पूजन करके उन्हें विदा किया और अपने सेवकों को द्वारका जाने का आदेश दिया। |
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| Vaishmpayana says - King! After listening to Narad's words, Balarama worshipped the great Brahmins who had come with him and sent them off and ordered his servants to go to Dwarka. 35 1/2. |
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