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श्लोक 9.54.23-25h  |
ततोऽब्रवीद् रौहिणेयो नारदं दीनया गिरा॥ २३॥
किमवस्थं तु तत् क्षत्रं ये तु तत्राभवन् नृपा:।
श्रुतमेतन्मया पूर्वं सर्वमेव तपोधन॥ २४॥
विस्तरश्रवणे जातं कौतूहलमतीव मे। |
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| अनुवाद |
| तब रोहिणीनन्दन बलराम ने विनीत स्वर में नारदजी से पूछा- 'तपस्वी! वहाँ एकत्रित हुए समस्त क्षत्रिय राजाओं का हाल मैं पहले ही सुन चुका हूँ। इस समय मुझे कुछ विशेष एवं विस्तृत समाचार जानने की बड़ी जिज्ञासा हो रही है।' |
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| Then Rohininandan Balarama asked Naradji in a humble voice- 'Ascetic! I had already heard about the condition of all the Kshatriya kings who had gathered there. At this time I am very curious to know some special and detailed news.' |
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