श्री महाभारत  »  पर्व 9: शल्य पर्व  »  अध्याय 54: प्लक्षप्रस्रवण आदि तीर्थों तथा सरस्वतीकी महिमा एवं नारदजीसे कौरवोंके विनाश और भीम तथा दुर्योधनके युद्धका समाचार सुनकर बलरामजीका उसे देखनेके लिये जाना  »  श्लोक 18-19
 
 
श्लोक  9.54.18-19 
जटामण्डलसंवीत: स्वर्णचीरो महातपा:॥ १८॥
हेमदण्डधरो राजन् कमण्डलुधरस्तथा।
कच्छपीं सुखशब्दां तां गृह्य वीणां मनोरमाम्॥ १९॥
 
 
अनुवाद
महाराज! महातपस्वी नारद जटाओं से सुशोभित थे और स्वर्ण वस्त्र धारण किए हुए थे। उनके पास एक कमंडल, एक स्वर्ण दंड और कच्छपी नामक एक सुंदर वीणा भी थी जिससे मधुर ध्वनि निकल रही थी।
 
King! The great ascetic Narada was adorned with matted hair and wore a golden robe. He also had a kamandalu (water pot), a golden staff and a beautiful Veena called Kachchhapi which produced soothing sounds.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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