श्री महाभारत  »  पर्व 9: शल्य पर्व  »  अध्याय 51: सारस्वततीर्थकी महिमाके प्रसंगमें दधीच ऋषि और सारस्वत मुनिके चरित्रका वर्णन  »  श्लोक 39-40h
 
 
श्लोक  9.51.39-40h 
न गन्तव्यमित: पुत्र तवाहारमहं सदा॥ ३९॥
दास्यामि मत्स्यप्रवरानुष्यतामिह भारत।
 
 
अनुवाद
भरतनंदन! सरस्वती ने इस प्रकार कहा- 'बेटा! तुम यहाँ से कहीं मत जाओ। मैं तुम्हें सदैव उत्तम मछलियाँ खाने को दूँगी; इसलिए तुम यहीं रहो।'
 
Bharatanandan! Saraswati said thus-'Son! You should not go anywhere from here. I will always give you the best fish for food; hence you stay here'.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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