Deprecated: str_replace(): Passing null to parameter #3 ($subject) of type array|string is deprecated in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 7 mahabharat 9.51.15-18h: उनके ऐसा कहने पर ऋषि ने पुत्र को स्वीकार कर लिया और अत्यन्त प्रसन्न हुए। भारतभूषण! उस द्विजश्रेष्ठ ने प्रेमपूर्वक अपने पुत्र का मस्तक सूंघा और उसे बहुत देर तक हृदय से लगाए रखा। महर्षि अत्यन्त प्रसन्न हुए और उन्होंने सरस्वती को वरदान दिया - 'सुप्रभात! विश्वेदेव! तुम्हारे द्वारा जल अर्पित करने से पितरगण तथा गन्धर्वों और अप्सराओं का समुदाय सभी तृप्त होकर लाभान्वित होंगे।' 15-17 1/2" | mahabharat अध्याय 9.51: सारस्वततीर्थकी महिमाके प्रसंगमें दधीच ऋषि और सारस्वत मुनिके चरित्रका वर्णन । mahabharat पर्व 9: शल्य पर्व । श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
उनके ऐसा कहने पर ऋषि ने पुत्र को स्वीकार कर लिया और अत्यन्त प्रसन्न हुए। भारतभूषण! उस द्विजश्रेष्ठ ने प्रेमपूर्वक अपने पुत्र का मस्तक सूंघा और उसे बहुत देर तक हृदय से लगाए रखा। महर्षि अत्यन्त प्रसन्न हुए और उन्होंने सरस्वती को वरदान दिया - 'सुप्रभात! विश्वेदेव! तुम्हारे द्वारा जल अर्पित करने से पितरगण तथा गन्धर्वों और अप्सराओं का समुदाय सभी तृप्त होकर लाभान्वित होंगे।' 15-17 1/2"
When he said this, the sage accepted the son and was very happy. Bharatbhushan! That Dwijashreshtha lovingly smelled the head of his son and hugged him for a long time. The great sage became very happy and gave a boon to Saraswati - 'Good morning! By offering water from you, Vishvedev, the ancestors and the community of Gandharvas and Apsaras will all be satisfied and benefited. 15-17 1/2"
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥