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व्रजन्तं लोकममलमपश्यद् देवपूजितम्।
चातुर्मास्यैर्बहुविधैर्यजन्ते ये तपोधना:॥ ३२॥
अनुवाद
देवल मुनि ने जैगीषव्य को उन तपस्वियों के निर्मल लोकों में जाते देखा, जो अनेक प्रकार के चातुर्मास यज्ञ करते हैं। वहाँ देवताओं द्वारा उनकी पूजा की जा रही थी।
Deval Muni saw Jaigishavya going to the pure worlds of those ascetics who perform various types of Chaturmas Yajnas. He was being worshipped by the Gods there.
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥