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श्लोक 9.48.68  |
तत्राप्युपस्पृश्य महानुभावो
वसूनि दत्त्वा च महाद्विजेभ्य:।
जगाम तीर्थं सुसमाहितात्मा
शक्रस्य वृष्णिप्रवरस्तदानीम्॥ ६८॥ |
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| अनुवाद |
| वृष्णिवंशवत्स्वतानिधि महापुरुष बलरामजी उस तीर्थ में स्नान करके तथा श्रेष्ठ ब्राह्मणों को धन दान करके उस समय एकाग्रचित्त होकर इन्द्रतीर्थ को चले गए ॥68॥ |
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| Vrishnivanshvatans great man Balramji, after taking bath in that pilgrimage and donating money to the best brahmins, at that time, being concentrated, went to Indra-tirtha. 68॥ |
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इति श्रीमहाभारते शल्यपर्वणि गदापर्वणि बलदेवतीर्थयात्रायां सारस्वतोपाख्याने बदरपाचनतीर्थकथने अष्टचत्वारिंशोऽध्याय:॥ ४८॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत शल्यपर्वके अन्तर्गत गदापर्वमें बलदेवजीकी तीर्थयात्रा और सारस्वतोपाख्यानके प्रसंगमें बदरपाचनतीर्थका वर्णनविषयक अड़तालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ४८॥
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