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श्लोक 9.48.22  |
हुताशनेन दग्धश्च यस्तस्या: काष्ठसंचय:।
अकाष्ठमग्निं सा दृष्ट्वा स्वशरीरमथादहत्॥ २२॥ |
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| अनुवाद |
| उसने जो भी ईंधन इकट्ठा किया था, वह सब अग्नि में जल गया। तब यह देखकर कि अग्नि में ईंधन नहीं है, उसने अपने शरीर को जलाना आरम्भ कर दिया॥22॥ |
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| All the fuel he had stored up was burnt in the fire. Then seeing that the fire was without fuel, he began to burn his own body.॥ 22॥ |
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