श्री महाभारत  »  पर्व 9: शल्य पर्व  »  अध्याय 48: बदरपाचनतीर्थकी महिमाके प्रसंगमें श्रुतावती और अरुन्धतीके तपकी कथा  »  श्लोक 13-14
 
 
श्लोक  9.48.13-14 
तपसा लभ्यते सर्वं यथाभूतं भविष्यति॥ १३॥
यथा स्थानानि दिव्यानि विबुधानां शुभानने।
तपसा तानि प्राप्याणि तपोमूलं महत् सुखम्॥ १४॥
 
 
अनुवाद
शुभन्! तप से सब कुछ प्राप्त होता है। तुम्हारी मनोकामना भी यथावत् पूर्ण होगी। देवताओं के दिव्य धाम तप से प्राप्त होते हैं। तप ही महान सुखों का मूल कारण है।॥13-14॥
 
‘Shubhan! Everything is achieved by penance. Your desire will also be fulfilled as it is. The divine abodes of the gods can be achieved by penance. Penance is the root cause of great happiness.॥ 13-14॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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