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श्लोक 9.48.12-13h  |
उग्रं तपश्चरसि वै विदिता मेऽसि सुव्रते।
यदर्थमयमारम्भस्तव कल्याणि हृद्गत:॥ १२॥
तच्च सर्वं यथाभूतं भविष्यति वरानने। |
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| अनुवाद |
| सुव्रते! मैं जानता हूँ कि तुम बहुत घोर तप कर रही हो। कल्याणी! सुमुखी! जिस उद्देश्य से तुमने यह अनुष्ठान आरम्भ किया है और जो संकल्प तुम्हारे हृदय में है, वह सब सचमुच सफल होगा।॥ 12 1/2॥ |
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| ‘Suvrate! I know you are performing a very intense penance. Kalyani! Sumukhi! The purpose for which you have started this ritual and the resolution in your heart, all of it will be truly successful.॥ 12 1/2॥ |
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