श्री महाभारत  »  पर्व 9: शल्य पर्व  »  अध्याय 43: ऋषियोंके प्रयत्नसे सरस्वतीके शापकी निवृत्ति, जलकी शुद्धि तथा अरुणासंगममें स्नान करनेसे राक्षसों और इन्द्रका संकटमोचन  »  श्लोक 6-7
 
 
श्लोक  9.43.6-7 
अथागम्य महाभागास्तत् तीर्थं दारुणं तदा॥ ६॥
दृष्ट्वा तोयं सरस्वत्या: शोणितेन परिप्लुतम्।
पीयमानं च रक्षोभिर्बहुभिर्नृपसत्तम॥ ७॥
 
 
अनुवाद
हे राजनश्रेष्ठ! वहाँ पहुँचकर उन महर्षियों ने देखा कि उस तीर्थ की दशा बहुत दयनीय हो गई है। वहाँ सरस्वती का जल रक्त से भरा हुआ है और बहुत से राक्षस उसे पी रहे हैं। ॥6-7॥
 
O best of kings! On reaching there those great sages saw that the condition of that pilgrimage place had become pitiable. The water of Sarasvati there was filled with blood and many demons were drinking it. ॥ 6-7॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)